हम कौन हैं और कहां से आए हैं

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हम कौन हैं और कहां से आए हैं. यह प्रश्न हमारे दिमाग में हमेशा रहता है. इस प्रश्न का जवाब के लिए, हम बहुत भटकते हैं. क्या हमें इस प्रश्न का जवाब आज तक मिल पाया है. हम आज इस बारे में ही बात करते हैं. कि हम कौन हैं और कहां से आए हैं.

परमात्मा ने हम सबको अपनी शक्ल पर बनाया है.
हम सब उस परमात्मा के बच्चे हैं. जो इस मृत्युलोक में आए हैं. परमात्मा के मन में मौज उठी . और उसने एक बहुत ही सुंदर कुदरत बना दी. एक कायनात बना दी जिसमें बड़े ही सुंदर सुंदर पहाड़, नदियां, झरने, तालाब समंदर बनाया. तरह तरह के फूल फल पेड़ पौधे बनाएं. फिर उसने देखा कि यहां तो कोई इनका लुत्फ उठाने वाला नहीं है.

फिर उसने यहां पर कुछ आत्माओं को इस संसार में भेजा जिन्हें अलग-अलग रूप दे दिया गया. किसी को जानवर किसी को पक्षी तो किसी को इंसान बनाया गया. ताकि हम सब मिलकर इस सृष्टि का आनंद उठा सकें. और यहां से घूम फिर कर वापस अपने घर पहुंच सके जहां वह परमात्मा हम सब का इंतजार कर रहा है. जो हमारा असली घर है.

जैसे एक मां अपने बच्चे का इंतजार करती है. जब बच्चा पढ़ने या फिर किसी काम के लिए बाहर जाता है तो मां उसके इंतजार में रहती है ठीक इसी तरह से वह परमात्मा भी हम सब का इंतजार कर रहा है कि कब हम अपने असल घर वापस आएंगे.

लेकिन इस संसार में आकर हम सब कुछ भूल गए हैं. अपने आपको इसी संसार का हिस्सा समझ कर बैठ गए हैं हमें यह तक भी याद नहीं है. कि हम सब उस परमात्मा की संतान है और हमें वापस अपने घर भी जाना है. क्योंकि इस यह संसार के रंग तमाशे हमें इतने अच्छे लगते हैं. कि इनमें हमारा मन कुछ इस तरह से लग गया है कि वापस जाने का नाम ही नहीं ले रहा. और इस सृष्टि का हमने अपने आप को हिस्सा समझ लिया है.

कैसे हम यहां पर आकर भूल गए हैं. एक छोटी सी कहानी के जरिए समझने की कोशिश करते हैं.

एक बार भेड़ों का झुंड जंगल में घास चरने गया. वहां पास में ही है एक छोटा सा शेर का बच्चा अपनी मां से बिछड़ कर भेड़ों के बीच में आ गया. शेर का बच्चा अभी छोटा था. उसको नहीं पता था कि यह भेड़े है. और मैं शेर हूं. वह उनके साथ ही घूमने फिरने लगा घास फूस खाने लगा मतलब यह है. वह अपने आप को भेड़ ही समझने लगा, वह अपनी पहचान ही भूल गया.

एक दिन शेर का बच्चा भेड़ों के साथ घूम रहा था. वहां पास में ही शेर ने उनको देखा. शेर आगे बढ़ने ही लगा था. कि उसने देखा भेड़ों के बीच में एक शेर का बच्चा भी है. वह यह देखकर हैरान रह गया, कि यह शेर होकर भेड़ों के बीच में क्या कर रहा है. वह उस बच्चे के पास गया और उसने उसको बोला कि तुम शेर हो कर भेड़ों के बीच में क्या कर रहे हो. बच्चा बोला मैं भी भेड़ हूं. शेर नहीं हूं.

शेर उस बच्चे को एक नदी के पास ले गया और कहां देखो नदी में तुम्हारा और मेरा चेहरा एक जैसा है. तुम भी मेरी तरह हो. शेर का बच्चा मानने को तैयार ही नहीं हुआ कि मैं शेर हूं. तब शेर ने कहा. मैं तुम्हें दहाड़ कर दिखाता हूं. फिर तुम भी मेरी तरह दहाड़ना. शेर जोर से दहाड़ा, उसको देख कर शेर के बच्चे ने भी जोर से दहाड़ा. उनकी दहाड़ सुनकर भेड़ों का झुंड वहां से भाग गया. इस कहानी से हमें यही पता चलता है. कि इसी तरह हम भी परमात्मा की संतान हैं. और हमारी हस्ती बहुत ही ऊंची है लेकिन हम अपनी पहचान भूल कर इस दुनिया को ही अपना घर समझ कर बैठ गए हैं. इस कहानी से आपको पता चल गया होगा कि हम कौन हैं. और कहां से आए हैं

उस परमात्मा ने अपनी कुदरत को बनाया ही इतना अच्छा है कि यहां से वापस जाए कौन. लेकिन संतों महात्माओं ने बताया है कि जो परमात्मा अपने निज घर में रहता है. वह घर तो इससे भी कहीं सुहावना है और इससे भी कहीं ज्यादा आनंद है वहां पर. वह हमारा असल घर है. वहां सब आत्माएं एक महारानी की तरह रहती थी जो इस संसार में आकर गुलाम बन गई है मन माया की.
अगर हम इस गुलामी से आजाद होना चाहते हैं तो हमें अपने देश अपने असल घर जाना होगा जहां हमारा तख्त और ताज आज भी इंतजार कर रहा है.

और वहां पहुंचने का जरिया केवल उस परमात्मा की भक्ति है जब हम उस परमात्मा की बंदगी करेंगे. तब हम उस परमात्मा के नजदीक होते चले जाएंगे और एक दिन अपने असल घर भी पहुंच जाएंगे. जहां से हम आए थे. उसी परमात्मा की हम अंश है और एक दिन उसी परमात्मा में जाकर समा जाएंगे.
तो चलो फिर उस परमात्मा की खोज करते हैं उसकी भक्ति करते हैं और अपनी असल देश पहुंचते हैं.

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