क्या परमात्मा को भी हमारी याद आती है

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हां जो परमात्मा को याद करते हैं उन्हें वह परमात्मा भी याद करता है यह बातें कुरान शरीफ में भी लिखी हुई है कि जो अल्लाह को याद करता है अल्लाह उसे याद करता है. और वैसे भी अगर याद का उल्टा किया जाए तो दया बनता है क्योंकि जो परमात्मा को जितना ज्यादा याद करता है वह उतना उसकी दया का पात्र बनता है.

और परमात्मा जिस पर भी दया करता है उे कभी भी भूलता नहीं है उस पर फिर दया की ऐसी बारिश करता है कि हर हाल में उसका साथ निभाता है. इसलिए हमें हर हाल में उस परमात्मा को याद करना चाहिए. जैसे एक बच्चा बार-बार अपनी मां को पुकारता है तो मां का ध्यान बच्चे की तरफ ही रहता है इसी तरह जब हम भी बार-बार उस परमात्मा को याद करते हैं पुकारते हैं तो उस भगवान का ध्यान भी हमारी तरफ ही रहता है.

और फिर जब चाहे कोई भी मुश्किल आए. हर मुश्किल में से वह निकाल कर ले जाता है. इसे मैं एक छोटी सी कहानी के जरिया आपको बताने की कोशिश करती हु.

एक संत हुआ करते थे । उनकी इबादत या भक्ति इस कदर थीं कि वो अपनी धुन में इतने मस्त हो जाते थे की उनको कुछ होश नहीं रहता था । उनकी अदा और चाल इतनी मस्तानी हो जाती थीं । वो जहाँ जाते , देखने वालों की भीड़ लग जाती थी। और उनके दर्शन के लिए लोग जगह -जगह पहुँच जाते थे । उनके चेहरे पर नूर साफ झलकता था ।

वो संत रोज सुबह चार बजे उठकर ईश्वर का नाम लेते हुए घूमने निकल जाते थे। एक दिन वो रोज की तरह अपने मस्ति में मस्त होकर झूमते हुए जा रहे थे।रास्ते में उनकी नज़र एक फ़रिश्ते पर पड़ी और उस फ़रिश्ते के हाथ में एक डायरी थीं । संत ने फ़रिश्ते को रोककर पूछा आप यहाँ क्या कर रहे हैं ! और ये डायरी में क्या है ?

फ़रिश्ते ने जवाब दिया कि इसमें उन लोगों के नाम है जो खुदा को याद करते है । यह सुनकर संत की इच्छा हुई की उसमें उनका नाम है कि नहीं, उन्होंने पुछ ही लिया की, क्या मेरा नाम है इस डायरी में ? फ़रिश्ते ने कहा आप ही देख लो और डायरी संत को दे दी ।

संत ने डायरी खोलकर देखी तो उनका नाम कही नहीं था । इस पर संत थोड़ा मुस्कराये और फिर वह अपनी मस्तानी अदा में रब कोयाद करते हुए चले गये ।दूसरे दिन फिर वही फ़रिश्ते वापस दिखाई दिये पर इस बार संत ने ध्यान नहीं दिया और अपनी मस्तानी चाल में चल दिये।इतने में फ़रिश्ते ने कहा आज नहीं देखोगे डायरी । तो संत मुस्कुरा दिए और कहा, दिखा दो और जैसे ही डायरी खोलकर देखा तो, सबसे ऊपर उन्ही संत का नाम था .

इस पर संत हँस कर बोले क्या खुदा के यहाँ पर भी दो-दो डायरी हैं क्या ? कल तो था नहीं और आज सबसे ऊपर है ।इस पर फ़रिश्ते ने कहा की आप ने जो कल डायरी देखी थी, वो उनकी थी जो लोग ईश्वर से प्यार करते हैं । आज ये डायरी में उन लोगों के नाम है, जिनसे ईश्वर खुद प्यार करता है ।

बस इतना सुनना था कि वो संत दहाड़ मारकर रोने लगे, और कितने घंटों तक वही सर झुकाये पड़े रहे, और रोते हुए ये कहते रहे ए ईश्वर यदि में कल तुझ पर जरा सा भी ऐतराज कर लेता तो मेरा नाम कही नहीं होता । पर मेरे जरा से सबर पर तु मुझ अभागे को इतना बड़ा ईनाम देगा । तू सच में बहुत दयालु हैं तुझसे बड़ा प्यार करने वाला कोई नहीं और बार-बार रोते रहें.

देखा दोस्तों परमात्मा की बंदगी में अंत तक डटे रहो, सबर रखो क्योंकि जब भी परमात्मा की मेहरबानी का समय आएगा तब अपना मन बैचेन होने लगेगा. लेकिन तुम वहा डटे रहना ताकि वो महान प्रभु हम पर भी कृपा करें !

परमात्मा की दया बहुत है बस उसे याद करने वाले बहुत कम लोग हैं. वह तो चाहता है कि कोई मुझे याद करें और मैं उसके ऊपर दया बरसादू . हमें कभी भी अपनी बंदगी पर शक नहीं करना चाहिए. परमात्मा पर विश्वास रखना चाहिए. क्योंकि बंदगी चाहे कम हो चाहे ज्यादा हो परमात्मा कभी भी अपनी दया मेहर कम नहीं करता. सबके हिस्से में दया बराबर ही आती है इसलिए हमें बिना किसी सोच-विचार के उस परमात्मा की बंदगी में लगे रहना है.

तो चलो आज से हम उस परमात्मा को याद करते हैं. ताकि उस परमात्मा का ध्यान हमारी तरफ रहे. और हम भी अपने जीवन में खुशहाल रहे.

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धन्यवाद

"God is not your bank account. He is not your means of provision. He is not the hope of your pay. He is not your life. He's not your god. He's your Father."